शनिवार, 6 मई 2023

हम दूर देश के पाती..

बेकरार रंग की तबीयत संग

सादा आकाश सा समतल मन

दो निर्दोष प्राण का 

भटका, भूला तन

भला कहां तलाशता है

आत्मिक जतन ?

एक मेरा कबूलनामा,

दूसरी तुम्हारी गवाही..

मौन संधान का जिरह शेष है

हाथ जोड़े उस सजायाफ्ता का 

भटका, भूला तन

भला कहां तलाशता है

भूख, नींद का हाहाकारी स्वर ?

तुम शीतल चांद का आंगन 

हम दूर देश के पाती

जो वक़्त रात ने रख दिया

समेट कर, कचोट कर

एक मेरा कबूलनामा,

दूसरी तुम्हारी गवाही

तुम मीठे बसंत की तिलस्म सी

मैं पतझड़ में रहा आत्मरत

जो थक गए, वो लौट गए

बस, इतना रहा सारांश....

शनिवार, 23 जुलाई 2022

बेहद असामान्य सा..

शायद कोई एक
उठ खड़ा होगा 
बेहद असामान्य सा,
तरंगदैर्ध्य की लय साधते
समीप होकर भी 
अदृश्य महक बटोरते
कांपते हाथों को सौंपते
धड़कते हृदय का दस्तावेज
बेहद असामान्य सा...
यही कहना दुरुस्त होगा
समीचीन होगा, तटस्थ होगा
प्रेम में यही होगा
पेड़ों की मदहोश आदतें
उठ खड़ी होगी आदतन
आंखें डूबने को होगी
शब्द दर शब्द किस्सागोई में...
जब कोई एक, 
यूं ही सवाल पूछेगा
मौसम की बदमिजाजी पर
अल्हड़ हवा की मानिंद
जो कुछ न हुआ होगा
एक संग होकर
कितना कुछ होगा 
बेहद असामान्य सा ??




शनिवार, 4 जून 2022

कहां पनाह, कौन सा दर ?

समय के सिलवट में उतरना

जैसे उतरना हो 

सत्यजनित आग का,

नादां जिस्म की कोपलों से रिसना

जैसे रिसता है प्रायश्चित

सब टूट कर बेजार

ब्रह्मलीन हुए भी तो...

कहां पनाह, कौन सा दर ?

ये यकीनन दिलचस्प होगा...

शायद होगा ये भी...

..कि कुचली सड़कें वापस नही आएगी

पानी का भी वही अंदाज ओ अंजाम...

पाखी भी चूर हो सिमट रहे

थकान में लिपट रहे...

कहां पनाह, कौन सा दर ?

शायद ही कोई आना चाहे

बंजर, वितान शब्दों का ख्वाब ओढ़े

ये वक़्त का पंचनामा,

उम्मीदों की फेहरिस्त

नीम शहद की खुशबू सी...

कटोरे में बासी भात को निहारती भूख

ये यकीनन दिलचस्प होगा

ओह, ये तड़प, वो आग

सीने से चिपकाए माँ

जेहन में उबलती बेचारगी

बेगानगी को कैसे लिखें, कहाँ रखें ?






शनिवार, 11 सितंबर 2021

रेत के तजुर्बे...

साजिशन मुकम्मल होने का

स्वांग रचते,

नित नये तिलिस्म में

जन्म लेते, जीते

रेत के तजुर्बे..

मेरे ही शब्द के 

एकाकी सारथी

सुनो, देखो, समझो

कि धूप ही 

नरदेह का श्रृंगार है.......

अनगिन स्नेहिल धारा में 

बहके-आह्लादित

टूटते मन का गीला परिवेश

फिर से बिखरने का

अबोध अनहद स्वर

सुनो, देखो, समझो 

कि सिर्फ प्रेम ही

खुदा की आदत है....

आत्मा का झूमना, उमड़ना

सच-सच सहेजना

गाहे-गाहे रिसना

महसूसना...

आधी-आधी नैतिकता का

आधा-आधा संकल्प,

कुछ पवित्र फासलों में

मेरे ही शब्द के 

एकाकी सारथी

सुनो, देखो, समझो

कि निष्पाप खुशबू को

बचाए रखना ही 

समय का मुकम्मल संकल्प है....








बुधवार, 17 जुलाई 2019

तुम्हारी बज्म से बाहर भी एक दुनिया है.
मेरे हुजूर, बड़ा जुर्म है ये बेखबरी.....

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

कभी नासमझ रात तलाशे मन...

नितांत नरदेह की दुश्वारियों में
ढेर सारा कल्पित मन
अलौकिक, अदम्य व असहज
बेतरतीब हमसफ़र है मन
एक-दूसरे पर सवार बंजर, बेअसर
ढेर सारा अमानुष मन
सवाल तो नहीं है मन
आह... ऐसा भी मन
लिपटा है एकांत संग मन..
बेमौत मरता भीतर-भीतर 
मोह-लिप्सा में पिसता मन
रंज कोलाहल और रंजोगम
मन का पहाड़ तरासता मन
कुचला मन, भींगा मन
रोज-रोज का दमन
कितना अहसान है
मेरे मन पे तेरा मन
तुम क्यों हो पंखुरी जैसे मन?
खिलना, महकना मंद-मंद
सवाल तो नहीं है मन
निर्मम समय की क्रूर कथा मन
निरुपाय सत्य की आहत व्यथा मन
मन का ऐसा मंजर,
मन तो है ऐसा बेमन
निर्लज्ज, निरुदेश्य किश्त दर किश्त
आह... ऐसा भी मन.....
मन माफिक फरेबी मजा है मन
तेरी इबादत की एक सजा है मन...
कभी नासमझ रात तलाशे मन
कभी जबरन याद तलाशे मन
तुम क्यों हो पंखुरी जैसे मन
आह... ऐसा भी मन
..................................................................
क्या कहोगे ?

कुछ सजा और मिला दो
चुपके से लानत फैला दो
काट-काट के राख बिछा दो
बच्चों को यूँ शब्द बना दो

क्या कहोगे, क्या करोगे ?
मातम की क्या मात रचोगे ?
सिर्फ सन्नाटे की बात कहोगे ?
किलकारियों पर बिसात रचोगे ?
..........................................................................











मंगलवार, 21 मार्च 2017

कोई हासिल सा हक़...


 तुम कुछ शब्दों में बांधते हो
प्रेम की समीक्षाओं को,
नेह के पवित्र सूरज को
वैराग्य के असीमित ताप को.
लालायित सपनों के इस जहाँ में,
तुम कभी तो हवाओं संग दिखोगे.
नासमझ-नाउम्मीद सी
तुम कभी तो प्रार्थना में मिलोगे,
कभी तो ईश्वर की तरह बरसोगे.
कोई हासिल सा हक़ है तुम पर..
जैसे-तैसे खड़ी लकीरों में,
रोज-रोज मेरी एक आदत मरती है,
बरबस निरंतर अनबूझ सवाल गढ़ती है.
रास्ते भी हैं कुछ प्रतीक्षाओं जैसे,
हौसले भी हैं कुछ हिमालय जैसे
तुम कभी तो अनगढ़ सपनों में भटकोगे,
एक पड़ाव भर शब्द भारी है तुम पर..
तुम कभी तो सुनोगे वेदना की दखल को,
तुम कभी तो जी उठोगे हंसी के कोमल चित्त में
रोज-रोज मेरी एक आदत मरती है,
बरबस निरंतर अनबूझ सवाल गढ़ती है.

.............................................

नाजुक लटों में लिपटा
तंग जायकों में सिमटा
उम्मुक्त कविताओं का मोहपाश
बिखरे बेसुध घर में
निर्लिप्त पानी रिझाती
पापी मन की प्यास
...और ये दिन जा रहे. 
शांत-अधीर खेतों से
उठकर उगने लगी राख
थकी-बुझी बेदिल दोपहर में
किश्त दर किश्त किस्सों से
बर्तन की सिलवटों में लिपटा
शांत एकाकी आँगन 
 ...और ये दिन जा रहे.