शुक्रवार, 5 जनवरी 2024

ठहर जाओ फिर वहीं...

...तो इस पार कुछ भी नहीं

भाव, कोलाहल, क्रंदन नहीं

चन्द बूंदों की लिप्सा, नाहक जिजीविषा

ठहरी उम्मीदों की निर्वात पुकार

...तो बेशर्त मान जाओ

अब ख्वाब दूसरा नहीं

छटपटाते मोह से अलग-थलग

ठहर जाओ फिर वहीं

निर्मम अज्ञात ध्रुव पर,

कुछ भी नहीं पनपा

पाषाण समय के पास,

हम-तुम नासमझ जख्म में भींगे...

ठहर जाओ फिर वहीं,

प्रेमिल स्वर में यहीं कहीं...

टूटा-बिखरा जस का तस

वो पल, आह ! कैसा गुमां ?

समेट लो अपनी निजता

अक्षुण्ण हृदय में,

कसमसाते स्वर से थाम लो

बचा-खुचा एकान्त.....






शनिवार, 6 मई 2023

हम दूर देश के पाती..

बेकरार रंग की तबीयत संग

सादा आकाश सा समतल मन

दो निर्दोष प्राण का 

भटका, भूला तन

भला कहां तलाशता है

आत्मिक जतन ?

एक मेरा कबूलनामा,

दूसरी तुम्हारी गवाही..

मौन संधान का जिरह शेष है

हाथ जोड़े उस सजायाफ्ता का 

भटका, भूला तन

भला कहां तलाशता है

भूख, नींद का हाहाकारी स्वर ?

तुम शीतल चांद का आंगन 

हम दूर देश के पाती

जो वक़्त रात ने रख दिया

समेट कर, कचोट कर

एक मेरा कबूलनामा,

दूसरी तुम्हारी गवाही

तुम मीठे बसंत की तिलस्म सी

मैं पतझड़ में रहा आत्मरत

जो थक गए, वो लौट गए

बस, इतना रहा सारांश....

शनिवार, 23 जुलाई 2022

बेहद असामान्य सा..

शायद कोई एक
उठ खड़ा होगा 
बेहद असामान्य सा,
तरंगदैर्ध्य की लय साधते
समीप होकर भी 
अदृश्य महक बटोरते
कांपते हाथों को सौंपते
धड़कते हृदय का दस्तावेज
बेहद असामान्य सा...
यही कहना दुरुस्त होगा
समीचीन होगा, तटस्थ होगा
प्रेम में यही होगा
पेड़ों की मदहोश आदतें
उठ खड़ी होगी आदतन
आंखें डूबने को होगी
शब्द दर शब्द किस्सागोई में...
जब कोई एक, 
यूं ही सवाल पूछेगा
मौसम की बदमिजाजी पर
अल्हड़ हवा की मानिंद
जो कुछ न हुआ होगा
एक संग होकर
कितना कुछ होगा 
बेहद असामान्य सा ??




शनिवार, 4 जून 2022

कहां पनाह, कौन सा दर ?

समय के सिलवट में उतरना

जैसे उतरना हो 

सत्यजनित आग का,

नादां जिस्म की कोपलों से रिसना

जैसे रिसता है प्रायश्चित

सब टूट कर बेजार

ब्रह्मलीन हुए भी तो...

कहां पनाह, कौन सा दर ?

ये यकीनन दिलचस्प होगा...

शायद होगा ये भी...

..कि कुचली सड़कें वापस नही आएगी

पानी का भी वही अंदाज ओ अंजाम...

पाखी भी चूर हो सिमट रहे

थकान में लिपट रहे...

कहां पनाह, कौन सा दर ?

शायद ही कोई आना चाहे

बंजर, वितान शब्दों का ख्वाब ओढ़े

ये वक़्त का पंचनामा,

उम्मीदों की फेहरिस्त

नीम शहद की खुशबू सी...

कटोरे में बासी भात को निहारती भूख

ये यकीनन दिलचस्प होगा

ओह, ये तड़प, वो आग

सीने से चिपकाए माँ

जेहन में उबलती बेचारगी

बेगानगी को कैसे लिखें, कहाँ रखें ?






शनिवार, 11 सितंबर 2021

रेत के तजुर्बे...

साजिशन मुकम्मल होने का

स्वांग रचते,

नित नये तिलिस्म में

जन्म लेते, जीते

रेत के तजुर्बे..

मेरे ही शब्द के 

एकाकी सारथी

सुनो, देखो, समझो

कि धूप ही 

नरदेह का श्रृंगार है.......

अनगिन स्नेहिल धारा में 

बहके-आह्लादित

टूटते मन का गीला परिवेश

फिर से बिखरने का

अबोध अनहद स्वर

सुनो, देखो, समझो 

कि सिर्फ प्रेम ही

खुदा की आदत है....

आत्मा का झूमना, उमड़ना

सच-सच सहेजना

गाहे-गाहे रिसना

महसूसना...

आधी-आधी नैतिकता का

आधा-आधा संकल्प,

कुछ पवित्र फासलों में

मेरे ही शब्द के 

एकाकी सारथी

सुनो, देखो, समझो

कि निष्पाप खुशबू को

बचाए रखना ही 

समय का मुकम्मल संकल्प है....








बुधवार, 17 जुलाई 2019

तुम्हारी बज्म से बाहर भी एक दुनिया है.
मेरे हुजूर, बड़ा जुर्म है ये बेखबरी.....

गुरुवार, 2 नवंबर 2017

कभी नासमझ रात तलाशे मन...

नितांत नरदेह की दुश्वारियों में
ढेर सारा कल्पित मन
अलौकिक, अदम्य व असहज
बेतरतीब हमसफ़र है मन
एक-दूसरे पर सवार बंजर, बेअसर
ढेर सारा अमानुष मन
सवाल तो नहीं है मन
आह... ऐसा भी मन
लिपटा है एकांत संग मन..
बेमौत मरता भीतर-भीतर 
मोह-लिप्सा में पिसता मन
रंज कोलाहल और रंजोगम
मन का पहाड़ तरासता मन
कुचला मन, भींगा मन
रोज-रोज का दमन
कितना अहसान है
मेरे मन पे तेरा मन
तुम क्यों हो पंखुरी जैसे मन?
खिलना, महकना मंद-मंद
सवाल तो नहीं है मन
निर्मम समय की क्रूर कथा मन
निरुपाय सत्य की आहत व्यथा मन
मन का ऐसा मंजर,
मन तो है ऐसा बेमन
निर्लज्ज, निरुदेश्य किश्त दर किश्त
आह... ऐसा भी मन.....
मन माफिक फरेबी मजा है मन
तेरी इबादत की एक सजा है मन...
कभी नासमझ रात तलाशे मन
कभी जबरन याद तलाशे मन
तुम क्यों हो पंखुरी जैसे मन
आह... ऐसा भी मन
..................................................................
क्या कहोगे ?

कुछ सजा और मिला दो
चुपके से लानत फैला दो
काट-काट के राख बिछा दो
बच्चों को यूँ शब्द बना दो

क्या कहोगे, क्या करोगे ?
मातम की क्या मात रचोगे ?
सिर्फ सन्नाटे की बात कहोगे ?
किलकारियों पर बिसात रचोगे ?
..........................................................................











मंगलवार, 21 मार्च 2017

कोई हासिल सा हक़...


 तुम कुछ शब्दों में बांधते हो
प्रेम की समीक्षाओं को,
नेह के पवित्र सूरज को
वैराग्य के असीमित ताप को.
लालायित सपनों के इस जहाँ में,
तुम कभी तो हवाओं संग दिखोगे.
नासमझ-नाउम्मीद सी
तुम कभी तो प्रार्थना में मिलोगे,
कभी तो ईश्वर की तरह बरसोगे.
कोई हासिल सा हक़ है तुम पर..
जैसे-तैसे खड़ी लकीरों में,
रोज-रोज मेरी एक आदत मरती है,
बरबस निरंतर अनबूझ सवाल गढ़ती है.
रास्ते भी हैं कुछ प्रतीक्षाओं जैसे,
हौसले भी हैं कुछ हिमालय जैसे
तुम कभी तो अनगढ़ सपनों में भटकोगे,
एक पड़ाव भर शब्द भारी है तुम पर..
तुम कभी तो सुनोगे वेदना की दखल को,
तुम कभी तो जी उठोगे हंसी के कोमल चित्त में
रोज-रोज मेरी एक आदत मरती है,
बरबस निरंतर अनबूझ सवाल गढ़ती है.

.............................................

नाजुक लटों में लिपटा
तंग जायकों में सिमटा
उम्मुक्त कविताओं का मोहपाश
बिखरे बेसुध घर में
निर्लिप्त पानी रिझाती
पापी मन की प्यास
...और ये दिन जा रहे. 
शांत-अधीर खेतों से
उठकर उगने लगी राख
थकी-बुझी बेदिल दोपहर में
किश्त दर किश्त किस्सों से
बर्तन की सिलवटों में लिपटा
शांत एकाकी आँगन 
 ...और ये दिन जा रहे.

बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

ये कौन सा ववंडर है ?

दो रूहों के दरम्यान
एक ही पैमाने का होना
कितना दुष्कर है ?
परखना, महसूस करना
तुम्हारी धड़कन को, 
और ये जानना भी  कि..
हर जिद्दी सवाल के मोड़ पर
जिस्म के जंजाल जी उठते हैं
व्यर्थ-अनर्थ योग मिल उठते हैं.. 

ये कौन सा ववंडर है ?

चुपचाप अनगढ़ फैसला,
सबको उल्टा लटकाता है
मारकर तड़पाता है...
कितना दुष्कर है ?
समझना, समझाना
तुम्हारी पर्वत सी समझ को..
और ये मानना भी कि,
बसंत में ह्रदय से आह जन्म लेते हैं
चिथड़ों में लिपटे साये सिमट लेते हैं.

ये कौन सा ववंडर है ?

सरल सुलगता धुंआ
सबको बेहिसाब जलाता है
अनंत आग लहराता है
कितना दुष्कर है ?
क्षण दर क्षण जीना-मरना,
तुम्हारी बहकी हुई आगोश में...
और ये मानना भी कि..
जब निर्लिप्त मुस्कुराती हो
गैर इरादतन हौसला हो जाती हो.

ये कौन सा ववंडर है ?

यूँ ही जीता हुआ मन
कच्ची सहर तक जगमगाता है
नाहक़ कोशिशों में कसमसाता है
कितना दुष्कर है ?
पंखुरियों सा बरसना-बरसाना
नेमतों की राख को,
और ये मानना भी कि..
तुम जब समंदर सा हो जाती हो
मीठी खुशबू में उतर आती हो.

ये कौन सा ववंडर है ?

हवा की मनचाही दखल
दूर तक पत्थरों को उडाती है
सुकून के आँचल लहराती है
कितना दुष्कर है ?
समेटना-सहेजहना,
सजदे को सब्र से..
और ये मानना भी कि..
प्रेम आत्मा का विस्तार है
तिनका-तिनका रूह का आधार है.

                                                                                    











शनिवार, 21 जनवरी 2017

ह्रदय को हर बार कहा......

कितनी बेजुबान यादें
बातें करती मन की रातें
शिकवों से भी खूब अघाते
थक-मर कर एक स्वप्न गाते
पर तुम,
कहाँ छूट गए राही ?
याचनाओं का दर्द तय है
चाहत पर चुप्पी तय है
कुछ आंसू गिरना तय है
बेमन का मरना तय है
पर तुम,
कहाँ छूट गए राही ?
ह्रदय को हर बार कहा
थमने को थम जा ज़रा
न भाग के यूँ भाग जरा
चुप्पी को यूँ देख ज़रा
पर तुम,
कहाँ छूट गए राही ?
यूँ कहने से भी क्या होगा
जिद का भी एक फलसफा होगा
रच-रच कर भी क्या होगा
अब फासलों से ही फैसला होगा
पर तुम,
छूट गए राही ........................

गुरुवार, 30 जून 2016

तुम ऐसे ही रिहाई देते हो...

हर रात के आखिरी शब्द में
तुम जो रिहाई देते हो
कुछ मामूली बातों का
थोड़ा खामख्याली सा
शब्दों से
बिना हंसे, बोले
जी को दबा के
मुस्कान को मिटा के,
तुम जो रिहाई देते हो... 
कभी यूँ ही कह दो
रास्तों को मौन सहने दो,
थककर आह से टूटेंगे
जुड़ेंगे न मिटेंगे ...
थोड़ा प्यार की नींद सा
कहे-सुने
तुम जो रिहाई देते हो
कुछ ऐसा भी जी लो
नाहक बर्बादियां समेट लो
अपनी बांहों में,
सलीके से जलती बेताब बातें.. 
मृत्यु से उठती साँसे, 
बार-बार चिपकती गीली रातें।।
रिहाई को मंद-मंद बहने दो...
कुछ ऐसा भी जी लो.. 
कुछ आसान से शब्द,
पत्थर से मिल जाएंगे 
साजिशों की ओट में 
बोझिल सपने भरमाएंगे .... 
बिना कुछ कहे-सुने
तुम ऐसे ही रिहाई देते हो... 










शुक्रवार, 4 मार्च 2016

कुछ-कुछ जीना तेरे जैसा...

मेरे भीतर-
उतने बेपरवाह
नहीं हो सके तुम,
गुजर चुके दिनों की तरह....
शांत पहर को
धमधम करती
टिमटिमाती-मुस्कुराती
नादानियां ओह नादानियां,
मेरे अजीज, मेरे भगवान.......
कुछ-कुछ उद्वेग..
तुम्हारे जैसा
सवार होता था रोज,
कुछ-कुछ जीना तेरे जैसा
मेरे भीतर उठता था रोज,
मेरे भीतर-
उतने बिखर नहीं सके तुम
अमलतास-महोगनी जैसी
धमधम करती मासूमियत
अना की फ्रॉक पर आकर
मुस्कुराते-मचलते हुए
यूँ पसर जाना
खिलखिलाती नादानियों का
मेरे भीतर-
तेरी शालीन विशिष्टताएं
सधी हुई अदाएं
चल-चल कर रूकना,
मेरे अजीज, मेरे भगवान......
टूटती हुई धूप की
दम तोड़ती नेमतों में
तुम नहीं आये,
गुलाल से भींगे सम्मोहित
वेदना भरे आकाश में भी
तुम नहीं आये
मेरे भीतर
उतने बेपरवाह
नहीं हो सके तुम
जैसे जन्मता जीवन होता है
जैसे हँसता हुआ जख्मी आकाश होता है

                                                                               ( प्रिय मित्र व भाई निहार रंजन के नाम ) 


कोई आदत ऐसी तो नहीं...

हर दम आदतों से  
कुछ कहना-सुनना
मानीखेज जुर्म है दोस्तों.... 
कभी उल्टा करके देखो
थरथराते शब्दों को,
उनकी तड़पती आत्मा को
मत झकझोरों,
बिना पूछे धरती को
चाँद पे लटका दो,
कुछ भी फैला दो 
आदत से अलंग।। 
चुपके से हाथ जोड़
कभी उल्टा करके देखो
औपचारिक संवाद को,
उनकी तासीर निकालो
मुट्ठी में समंदर डूबा दो,
कुछ भी बहा दो
आदत से अलंग।। 
हर दम आदतों से  
कुछ कहना-सुनना
मानीखेज जुर्म है दोस्तों.....


रविवार, 22 नवंबर 2015

यही शून्यता राह है तेरी....

मैं सिर्फ
एक आदमी भर का
सवाल नहीं
एक शक्ल भी नहीं,
किसी समंदर में डूबे बुलबुलों का
गुच्छा भी नहीं
एक जिस्म..एक रूह
एक कहानी भर नहीं
..कि लिखते-लिखते
अवसान....अवसान।।।।।
अधमरे अन्धकार का
अजन्मा समय नहीं,
क्षण दर क्षण रचता हुआ
कोई दस्तावेज भी नहीं,
कौन सा पन्ना ?
कौन सा शब्द ?
डूबो रही है सबको
यही शून्यता राह है तेरी....
इसी काया से
सजेगा
अवसान....अवसान।।।।।
देखो, पथिक,
अनचाहा तो कुछ भी नहीं
कुछ भी नहीं
स्वीकार करो
स्वीकार करो ...
टूटे संवादों का  शापित स्वर
मधुर चोट की स्निग्ध तान
यही शून्यता राह है तेरी.....
कोई भी तुम्हारे जैसा नहीं
सूरज-चाँद जैसे
नहीं थे कभी
स्वीकार करो
स्वीकार करो ...
उमड़-घुमड़ सोती रातों का
स्वप्न अकेला..... बस अकेला


मंगलवार, 14 जुलाई 2015

हर शब्द से मुनासिब होना....

साबूत तौर-तरीके से
सर्वस्व मिट्टी का हो जाना
तुम्हारा सिर्फ एक अंजाम नहीं..
कुछ और भी इल्जाम आएंगे
एक-दो अलग से शिकवे-उलाहने
आएंगे ही तुम पर.....
ये सम्भव है कि
तुम प्रेम व पवित्रताओं के
अधूरे अंजाम से मारे जाओ
शायद-वायद तो नहीं
हाँ, बहुत हद तक. ..........
बहुत वक़्त अधूरा मरोगे
क्योंकि तुम उतना ही हो
जैसे अधूरी राख में
निर्वाण की अधमरी लौ.....
बिना किसी भूमिका के
कुछ और भी मौसम व
ऋतु चक्र का कोप-क्रंदन
हाँ, बहुत हद तक. ..........
कुछ मिथ्या, कुछ भ्रम व
कुछ-कुछ अदृश्य आदतों के
अंजाम से तुम्हें मरना होगा
ये सम्भव है कि
तुम अपने समय संकल्प में
एक न एक दिन डूब जाओ
क्योंकि तुम वैसे ही हो
जैसे अनसुलझे जीवन के झंझावातों में
कोई तुम्हारा ....
हाँ तुम्हारा......
मुक्ति का शोकगीत लिखता है
हर शब्द से मुनासिब होना
समय सापेक्ष नहीं होगा.....
तुम याद रखना
अधूरी कामनाओं को,
पानी जैसी प्रार्थनाओं को....
एक न एक पल को
परित्यक्त, अधूरे परिवेश के
अंजाम से तुम्हें मरना ही होगा


रविवार, 22 फ़रवरी 2015

ओ अलबेली....

ओ अलबेली....
मुश्किल है तुम्हें सौंपना
भरोसे का स्वभाव,
तुम बदल देना चाहती हो
बिखरे समय को,
अपनत्व के यकीन को
तुम प्रेम करती हो सिर्फ
अपने हिस्से के प्रेम से,
मन की अनुकूलता से
ओ अलबेली....
मुश्किल है तुम्हें सौंपना
निष्पाप होने का सुख
तुम पाना चाहती हो सिर्फ
अनकही विनम्रताएँ,
शून्य समतल सहजताओं में
डूबो देना चाहती हो
पहाड़ की संवेदनाएं,
ओ अलबेली....
मुश्किल है तुम्हें सौंपना
प्रेम की वैधताएं
तुम चाहती हो सिर्फ
बदरंग जीवन की
विशिष्ट आग को...

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

एक चूड़ी वाला भी...


वो जो कहता है कि 
उम्मीदों की हजारों सड़कें-गालियां
बेताब दिन का चिट्टा-पुर्जा लिये,
घर को लौट जाती है
और मर जाती है.………………… 
एक चूड़ी वाला भी 
शेष बोझों को उठाये, 
हर्षित होकर
मरने के लिए
कोई नुस्खा समझना चाहता है.… 
वो जो कहता है कि 
फागुन की इतराती प्यास भी
कुछ तेज बयारों का
हिसाब लेना चाहती है
और मर जाती है.…………………
एक चूड़ी वाला भी
घर की पथरायी
फीकी मुस्कुराहटों को,
ठीक-ठाक नाप देना चाहता है
वो बहुत सटीक जानता है कि, 
दो व सवा दो के नाप के बीच से
कितनी कहानियां बनती रहती है....
बचपन के उतावलेपन में
उसके नाजुक मशक्कत को
हम हैरत से पढ़ते थे
समझ नहीं पाते थे.........................
आज जब मैं,
ठीक-ठाक उसकी मशक्कत समझ सकता हूँ
उसकी आवारगी महसूस कर सकता हूँ
तो मति -गति को साक्षी मान
वह हर्षित होकर
मरने के लिए
कोई नुस्खा समझना चाहता है.… 
वो समझना चाहता है कि
तथाकथित सटीक आंकड़ों, मजबूत दुरुस्त बही-खातों में
उसके हिस्से का
दो व सवा दो के नाप जैसा
अब भी कुछ बचा है क्या ?

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

जिद अपनी तरकीब में...


जिद-संशय से घिरा
सिर्फ करना जानता है
सूरज पर शक,
चाँद का दमन....
ये शक आवारा-वाचाल लहरों को
निशब्द बनाती है
बेमतलब बात उठाती है ...
जिद न तो मेरा है,
और न ही तुम्हारा...
वो सिर्फ साजिश की
स्याह बदलियाँ हैं,
जिद अपनी तरकीब में
पारंगत हो जाए,
कोई बड़ी बात नहीं.....
जिद अपनी सहूलियत में
जीत जाए,
कोई बड़ी बात नहीं....
ये सहूलियत, ये पारंगतता
बस आत्मा को ललचाती है
बेमतलब बात उठाती है......

हमें तो जंगल ही नसीब था

हम ताबूत में बंद होकर
तुम्हारे हिस्से से
बाहर आ गए हैं...
लहुलूहान किताबों-जूतों को
उसी जंगल में
उलीच देना,
हमें तो कुछ देर
जंगल ही जीना था...
हम आँखें बंद कर
माँ के सपनों से निकल
बाहर आ गए हैं,
हमारी नाजुक शरारतों से
खून के धब्बे मिटा,
उसी ताबूत में
सुला देना
हमें तो जंगल ही नसीब था......

सोमवार, 4 अगस्त 2014

ये तुम्हारी हद है...


तप्त-तप्त मीठी रेत का मंजर
मेरा टुकड़ा-टुकड़ा दिन
लथपथ रात की बची-खुची
बेहयाई..
क्यों ठहरे हो तुम ?
एकाकार व एकाकार....
शताब्दियों से चलते
साँसों को साध
अगाध-अगाध
उस नाम-देह में
उद्दात मन की 
लहलहाती फसलें,
मेरी निरर्थकता के
हताशाबोध में
क्यों ठहरे हो तुम ?
निर्झर पलकों के दरम्यां
करीने से उठता
प्रतिशोध का संवाद
ओह.. मेरा टुकड़ा-टुकड़ा दिन.…
जिंदगी का पहाड़ा रटते-रटते
लथपथ रात की
अब तक बची-खुची
बेहयाई..
क्यों ठहरे हो तुम ?
उलझे मानकों के
समाधान की
कातर कतरन
तुमसे पहले किसने सोचा होगा
मेरी तुड़ी-मुड़ी शर्ट के बारे में,
पसीनों में डूबी
निरीह आदत के बारे में
जो पसरता जा रहा है
मचोड़ता जा रहा है
समूचे जिस्म पर
मर्यादित हंसी के साथ,
ये तुम्हारी हद है कि .…
भरपूर षडयंत्रों व साजिशों के
गहरे भंवर में
अब भी ठहरे हो तुम.…
तुमसे पहले किसने जिया होगा
मेरी थकान को
अपनी बेफिक्री में शुमार कर,
ओह... मेरा टुकड़ा-टुकड़ा दिन
ये तुम्हारी हद है.……………।

गुरुवार, 5 जून 2014

ऐसे ही...


तुम्हारे बदन के
नर्म, कोमल पलों से
कोई मुमकिन सा
एहसास चुरा लूँ तो........
तुम्हारे झुमके से
उठते आसावरी को
बहके हाथों से
छू लूँ तो........
तुम्हारे ह्रदय के
वनवास में
नहाये अंधेरों से
तुम्हें निकाल
कुछ गढ़ने की
जुर्रत कर लूँ तो.....
सोचता हूँ कि
तुम्हारे पाजेब में
एक बार सिर्फ
एक शीतल चाँद
टांक दूँ तो.....
दस-बीस मजबूत सवाल
तो गिरेंगे हीं
..................................
ठीक से तो देखो
बेकार से भटकते
उजालों को,
उन्हें बहने दो
हवाओं की मानिंद ....
आवारागर्द साँसें
किसी से पूछकर
सफर पूरा नहीं करती
.....................................
कुछ भी निरर्थक
निरुद्देश्य नहीं
हमारे जंगलों में,
मेरे अंश का ताप
मुझे जलायेगा, निखारेगा..
कच्चे पत्थरों से
जिद न करना,
पकते-पकते
कुंदन बनकर
निर्मम भीड़ में
मुझे भी समेट लेंगे
अपनी बाँहों में,
हमारे जंगलों का
यही रिवाज है..
...................................

सोमवार, 5 मई 2014

उसे तलाशना कैसा ....

धूप को.. 
आप कुछ भी कह लें
शब्द छोटे हो जाएंगे 
उसे तलाशना कैसा? 
उसे सिर पर उतार लेना है.… 
धूप तो हमारे
रग-रग में 
खिलती है
हम हरियाली बाहर ढूंढ़ते हैं
हम बारिश में भीगने 
बाहर भागते हैं
पर, धूप को तलाशना कैसा?
ख़ुदा से इश्क में
शब्द छोटे हो जाएंगे 
आप कुछ भी कह लें 
अंदर ही अन्दर 
बसंत सावन भादो 
धूप से रश्क करता है.....
वो हर पल चुपके से 
खूब तबीयत-तहज़ीब से उतरता है  
धूप ने कभी नहीं कहा, 
मुझे अपना सम्बल बन लो
अपनी बुद्धि का
क्यों नुक़सान करते हो ?
धूप ने कभी नहीं कहा,
मेरे पीछे चलो 
अपनी लज्जत को 
क्यों जाया करते हो ? 
कुछ भी कह लें हम 
बेअकली बड़ी हो जायेगी 
उसे तलाशना कैसा?
उसे सिर पर उतार लेना है.…
कान लगाकर सुनते हैं 
हम धूप को
ये कैसी बुद्धि है ?
जिसने छाया को 
भोले-भाले विश्वास सा
अपना संगी समझ लिया 
ये कैसी यात्रा है ?
ये कैसी यात्रा है ?.......