मेरे जिस्म में
तुम्हारे जिस्म की
बेहोशी, सनक व
खुर्राट धमक
पगलाई हुई
तमतमाई हुई
फटे-उघड़े आसमान से
तुम कैसे कहोगे ?....
नहीं बचा अब
रंगरेज हाथों में
उमड़-घुमड़
बेफिक्र छुअन..
संग संगाती
धूल उगाती
टूटी मिट्टी की तबीयत से
तुम कैसे कहोगे ?....
नहीं बचा अब
कच्ची कोशिशों में
जिद-जतन के
झूठ फरेब..
इठलाती सी
लहराती सी
घोर निरर्थक चेहरों से
तुम कैसे कहोगे ?....