
दारुण्य वक़्त में
अयाचित सत्य से परे
सब खत्म करने को भी कहा ...
तुम कौन हो ?
बेपरवाह कुछ भी..
कह देते हो..
सुना देते हो...
अंतस का ताप.
तुम नहीं थे सिर्फ
एहसास भर के लिए..
तुमने समेट लेने को कहा.
मायामय फेहरिस्त व मीन मेख
तुम कौन हो ?
उम्मीदों की धूप जैसे
बिखरते हो कहीं भी..
और उतर जाते हो..
एकदम भीतर
360 डिग्री के शक्ति संपन्न स्पेस पर..
कूटाख्यान शब्दों को
तोड़-मरोड़ कर
अनुरक्त डुबोते हो..
धवल चैतन्य स्पर्श में
तुम रिसते-भींगते
तप्त आस हो शायद !!!