रविवार, 22 फ़रवरी 2015

ओ अलबेली....

ओ अलबेली....
मुश्किल है तुम्हें सौंपना
भरोसे का स्वभाव,
तुम बदल देना चाहती हो
बिखरे समय को,
अपनत्व के यकीन को
तुम प्रेम करती हो सिर्फ
अपने हिस्से के प्रेम से,
मन की अनुकूलता से
ओ अलबेली....
मुश्किल है तुम्हें सौंपना
निष्पाप होने का सुख
तुम पाना चाहती हो सिर्फ
अनकही विनम्रताएँ,
शून्य समतल सहजताओं में
डूबो देना चाहती हो
पहाड़ की संवेदनाएं,
ओ अलबेली....
मुश्किल है तुम्हें सौंपना
प्रेम की वैधताएं
तुम चाहती हो सिर्फ
बदरंग जीवन की
विशिष्ट आग को...

25 टिप्‍पणियां:

  1. क्‍या खूब दर्शन प्रकट किया है चंचल सुन्‍दरी के प्रति स्थिर पौरुष प्रेम का! बहुत अप्रतिम प्रकार से, अनोखे अलंकारों के आधार पर प्रस्‍तुत यह कविता अत्‍यन्‍त मनभावन है। बधाई आपको।

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  2. देखिये इस अलबेली की अटखेलियाँ ..कितनी मनभावन है.

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  3. पता नहीं ये अलबेली नटखट है या सहज ... चंचल है या विकल ... पर प्रेम को क्या आंकना ...
    बहुत ही सुन्दर, लाजवाब रचना है ...

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  4. सचमुच भरोसे को निभाना इतना आसान तो नहीं...और अनुकूलता जो चाहता है वही तो मन है...सुंदर भाव !

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  5. अलबेली से ये '' मुश्किल है '' सिर्फ कहने भर के लिए है ताकि अपना अलबेलापन छुप जाये .

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  6. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    होली की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  7. बहुत खूब कही रविकर भाई .मुबारक .

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  8. बहुत खूब कही रविकर भाई .मुबारक .

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  9. अपने मन की मौज पर जीवन जीने का अभ्यस्त है जो वह प्रश्नों के व्यूह में क्यों फँसे भला !

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  10. राहुल भाई बहुत सुन्दर भाव जगत रचा है रचना में बिम्ब भी निराले।

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  11. राहुल भाई बहुत सुन्दर भाव जगत रचा है रचना में बिम्ब भी निराले।

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  12. अच्छी रचना
    मेरे ब्लॉग "डायनामिक" पर आपका स्वागत है .
    पता है manojbijnori12.blogspot.com
    अगर आपको पसंद आये तो कृपया फॉलो कर अपने सुझाव दे

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  13. ओ अलबेली....
    मुश्किल है तुम्हें सौंपना
    प्रेम की वैधताएं
    तुम चाहती हो सिर्फ
    बदरंग जीवन की
    विशिष्ट आग को...

    ओ अलबेली ,नई नवेली ,

    आग संग करत रही केलि

    सुन्दर रचना है भाई साहब भाव की गागर है

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  14. ओ अलबेली....
    मुश्किल है तुम्हें सौंपना
    प्रेम की वैधताएं
    तुम चाहती हो सिर्फ
    बदरंग जीवन की
    विशिष्ट आग को...

    ओ अलबेली ,नई नवेली ,

    आग संग करत रही केलि

    सुन्दर रचना है भाई साहब भाव की गागर है

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  15. शुक्रिया राहुल साहब बढ़िया लिख रहें हैं आप अक्सर हमारी आपकी टिप्पणियाँ परस्पर आंच बन जातीं हैं ऊर्जा हो जातीं हैं की।

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  16. शुक्रिया राहुल साहब बढ़िया लिख रहें हैं आप अक्सर हमारी आपकी टिप्पणियाँ परस्पर आंच बन जातीं हैं ऊर्जा हो जातीं हैं की।

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  17. श्रेष्ठ लेखन के लिए आपको बधाई सद्य प्रेरक टिप्पणियों के लिए आपका आभार दिल से।

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  18. शुक्रिया आपकी उत्प्रेरक टिप्पणी का आपकी अगली पोस्ट अपेक्षित है।

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  19. शुक्रिया आपकी उत्प्रेरक टिप्पणी का आपकी अगली पोस्ट अपेक्षित है।

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  20. बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ मित्र, मंगलकामनाएँ!

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