शनिवार, 23 जुलाई 2022
बेहद असामान्य सा..
शायद कोई एक
उठ खड़ा होगा
बेहद असामान्य सा,
तरंगदैर्ध्य की लय साधते
समीप होकर भी
अदृश्य महक बटोरते
कांपते हाथों को सौंपते
धड़कते हृदय का दस्तावेज
बेहद असामान्य सा...
यही कहना दुरुस्त होगा
समीचीन होगा, तटस्थ होगा
प्रेम में यही होगा
पेड़ों की मदहोश आदतें
उठ खड़ी होगी आदतन
आंखें डूबने को होगी
शब्द दर शब्द किस्सागोई में...
जब कोई एक,
यूं ही सवाल पूछेगा
मौसम की बदमिजाजी पर
अल्हड़ हवा की मानिंद
जो कुछ न हुआ होगा
एक संग होकर
कितना कुछ होगा
बेहद असामान्य सा ??
शनिवार, 4 जून 2022
कहां पनाह, कौन सा दर ?
समय के सिलवट में उतरना
जैसे उतरना हो
सत्यजनित आग का,
नादां जिस्म की कोपलों से रिसना
जैसे रिसता है प्रायश्चित
सब टूट कर बेजार
ब्रह्मलीन हुए भी तो...
कहां पनाह, कौन सा दर ?
ये यकीनन दिलचस्प होगा...
शायद होगा ये भी...
..कि कुचली सड़कें वापस नही आएगी
पानी का भी वही अंदाज ओ अंजाम...
पाखी भी चूर हो सिमट रहे
थकान में लिपट रहे...
कहां पनाह, कौन सा दर ?
शायद ही कोई आना चाहे
बंजर, वितान शब्दों का ख्वाब ओढ़े
ये वक़्त का पंचनामा,
उम्मीदों की फेहरिस्त
नीम शहद की खुशबू सी...
कटोरे में बासी भात को निहारती भूख
ये यकीनन दिलचस्प होगा
ओह, ये तड़प, वो आग
सीने से चिपकाए माँ
जेहन में उबलती बेचारगी
बेगानगी को कैसे लिखें, कहाँ रखें ?
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