सोमवार, 5 मई 2014

उसे तलाशना कैसा ....

धूप को.. 
आप कुछ भी कह लें
शब्द छोटे हो जाएंगे 
उसे तलाशना कैसा? 
उसे सिर पर उतार लेना है.… 
धूप तो हमारे
रग-रग में 
खिलती है
हम हरियाली बाहर ढूंढ़ते हैं
हम बारिश में भीगने 
बाहर भागते हैं
पर, धूप को तलाशना कैसा?
ख़ुदा से इश्क में
शब्द छोटे हो जाएंगे 
आप कुछ भी कह लें 
अंदर ही अन्दर 
बसंत सावन भादो 
धूप से रश्क करता है.....
वो हर पल चुपके से 
खूब तबीयत-तहज़ीब से उतरता है  
धूप ने कभी नहीं कहा, 
मुझे अपना सम्बल बन लो
अपनी बुद्धि का
क्यों नुक़सान करते हो ?
धूप ने कभी नहीं कहा,
मेरे पीछे चलो 
अपनी लज्जत को 
क्यों जाया करते हो ? 
कुछ भी कह लें हम 
बेअकली बड़ी हो जायेगी 
उसे तलाशना कैसा?
उसे सिर पर उतार लेना है.…
कान लगाकर सुनते हैं 
हम धूप को
ये कैसी बुद्धि है ?
जिसने छाया को 
भोले-भाले विश्वास सा
अपना संगी समझ लिया 
ये कैसी यात्रा है ?
ये कैसी यात्रा है ?....... 



11 टिप्‍पणियां:

  1. अंदर ही अन्दर
    बसंत सावन भादो
    धूप से रश्क करता है.....
    वो हर पल चुपके से
    खूब तबीयत-तहज़ीब से उतरता है

    कितनी गहरी बात..उजास को महसूस भर करना है.. बहुत सुंदर

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  2. धुप ही अंतस है ... बाह्य है ... चहुँ और है ...
    सर्वत्र है जो चीज़ उसे ढूँढना जरूरी नहीं ... हाँ मुश्किल भी होता उसे ढूंढना ....

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  3. धूप और छाया संसार में मन भरमाया।

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  4. उस धूप ने भले ही कुछ न कहा हो पर इस धूप ने छाया से सब कुछ कह दिया..

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  5. पर सब कुछ समझते हुए भी अबूझ तलाश को तलाशते रहने में जो आकर्षण है वो कभी कम ही नहीं होता है..

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  6. धूप है आखिर.. पर छाया शायद अनभिज्ञ रहता है कि उसका अस्तित्व धूप में ही है.

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  7. ऊर्जा और प्रकाश है धूप, छाया प्रतिक्रिया है उसी की .

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  8. बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया (नई ऑडियो रिकार्डिंग)

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  9. बहुत खूब , मंगलकामनाएं आपको !

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  10. धूप तो हमारे
    रग-रग में
    खिलती है
    हम हरियाली बाहर ढूंढ़ते हैं
    बहुत सुन्दर लिखा है ,राहुल जी

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