गुरुवार, 5 जून 2014

ऐसे ही...


तुम्हारे बदन के
नर्म, कोमल पलों से
कोई मुमकिन सा
एहसास चुरा लूँ तो........
तुम्हारे झुमके से
उठते आसावरी को
बहके हाथों से
छू लूँ तो........
तुम्हारे ह्रदय के
वनवास में
नहाये अंधेरों से
तुम्हें निकाल
कुछ गढ़ने की
जुर्रत कर लूँ तो.....
सोचता हूँ कि
तुम्हारे पाजेब में
एक बार सिर्फ
एक शीतल चाँद
टांक दूँ तो.....
दस-बीस मजबूत सवाल
तो गिरेंगे हीं
..................................
ठीक से तो देखो
बेकार से भटकते
उजालों को,
उन्हें बहने दो
हवाओं की मानिंद ....
आवारागर्द साँसें
किसी से पूछकर
सफर पूरा नहीं करती
.....................................
कुछ भी निरर्थक
निरुद्देश्य नहीं
हमारे जंगलों में,
मेरे अंश का ताप
मुझे जलायेगा, निखारेगा..
कच्चे पत्थरों से
जिद न करना,
पकते-पकते
कुंदन बनकर
निर्मम भीड़ में
मुझे भी समेट लेंगे
अपनी बाँहों में,
हमारे जंगलों का
यही रिवाज है..
...................................

13 टिप्‍पणियां:

  1. पकते-पकते
    कुंदन बनकर
    निर्मम भीड़ में
    मुझे भी समेट लेंगे
    अपनी बाँहों में,
    हमारे जंगलों का
    यही रिवाज है..
    ..........................

    बहुत खूब !!!!

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  2. गहन ....सुंदर अभिव्यक्ति ॥!!

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  3. गहरे भावों से युक्‍त।

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  4. सच कहा है कि कुछ भी बेवजह नहीं है इन जंगलों में. कितने जंगल है ...बिना पेड़ वाले .....बहुत कुछ सिखाते हैं. बताते हैं. तपाते है...और फिर आसावरी है ...ऐसे डुबाती है कि सारे जंगल बेमतलब हो जाते है. विविध रंगों की यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी.

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  5. बहुत ही खूब ... जंगलों के रिवाज़ बढ़ते ही जाते हैं ...
    और सही कहा है ... साँसों का सफ़र भी निश्चित होता है ...

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  6. बिल्‍कुल सच
    ये रिवाज़ यूँ ही हमारे आगे-आगे चलते रहते हैं

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  7. बहुत कोमल और गहरे भाव...सुंदर रचना !

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  8. हवाओं की मानिंद ....
    आवारागर्द साँसें
    किसी से पूछकर
    सफर पूरा नहीं करती
    बहुत दिनो बाद आपकी पोस्ट पढ़्ने को मिली बहुत अच्छा लगा..भाव पूर्ण

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  9. काश! आपको पढ़ने के बाद मुमकिन सा अहसास तारीफ़ में शब्दों को भी चुरा पाता तो..

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