सोमवार, 4 अगस्त 2014

ये तुम्हारी हद है...


तप्त-तप्त मीठी रेत का मंजर
मेरा टुकड़ा-टुकड़ा दिन
लथपथ रात की बची-खुची
बेहयाई..
क्यों ठहरे हो तुम ?
एकाकार व एकाकार....
शताब्दियों से चलते
साँसों को साध
अगाध-अगाध
उस नाम-देह में
उद्दात मन की 
लहलहाती फसलें,
मेरी निरर्थकता के
हताशाबोध में
क्यों ठहरे हो तुम ?
निर्झर पलकों के दरम्यां
करीने से उठता
प्रतिशोध का संवाद
ओह.. मेरा टुकड़ा-टुकड़ा दिन.…
जिंदगी का पहाड़ा रटते-रटते
लथपथ रात की
अब तक बची-खुची
बेहयाई..
क्यों ठहरे हो तुम ?
उलझे मानकों के
समाधान की
कातर कतरन
तुमसे पहले किसने सोचा होगा
मेरी तुड़ी-मुड़ी शर्ट के बारे में,
पसीनों में डूबी
निरीह आदत के बारे में
जो पसरता जा रहा है
मचोड़ता जा रहा है
समूचे जिस्म पर
मर्यादित हंसी के साथ,
ये तुम्हारी हद है कि .…
भरपूर षडयंत्रों व साजिशों के
गहरे भंवर में
अब भी ठहरे हो तुम.…
तुमसे पहले किसने जिया होगा
मेरी थकान को
अपनी बेफिक्री में शुमार कर,
ओह... मेरा टुकड़ा-टुकड़ा दिन
ये तुम्हारी हद है.……………।

12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर , मंगलकामनाएं आपको !

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  2. आपके इस काव्य की 'इमेजरी' लाजवाब है. एकदम अनूप है. और उसके अंदर की ध्वनि भी नायाब है.

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  3. शायद कविता का मन्‍तव्‍य समझने के लिए मैं नादान हूं।

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  4. उम्र भी तो टुकड़े टुकड़े रहती है ... किसी हिस्से की तरह जीती है हर पल को ... कभी मर्यादित तो कभी उद्दात मन के साथ ... मौत आने तक बेहया ही तो है ये ज़िन्दगी ...

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  5. वाह बहुत खूब।
    वाह बहुत खूब। सशक्त भावाभिव्यक्ति के नवायाम् रचती है ये रचना।

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  6. बहुत सुन्दर। शुक्रिया करता हूँ पूण :आपकी टिप्पणियों का।

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  7. वाह बहुत खूब जैसे अभिव्यक्ति को पंख लग गए हैं भाव और शब्द एक रूप हो गए हैं। शुक्रिया आपकी निरंतर प्रेरक टिपण्णियां का।

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  8. गहरे भावों को अभिव्यक्त करती सुंदर रचना।।।

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  9. शुक्रिया दोस्त आपकी टिप्पणियों का।

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  10. गहन मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति !!लाजवाब रचना .....!!

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  11. शुक्रिया दोस्त आपकी टिप्पणियों का।

    आपकी ओर से कुछ नए की प्रतीक्षा है।

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